Hydrocele in hindi

Hydrocele in hindi-हाइड्रोसील के कारण, लक्षण व् उपचार

अण्डकोष वृद्धि (Hydrocele) परिचयहाइड्रोसील, अण्डकोष वृद्धि, एक शिरा या फोतो (Scrotum) में जल भर जाना आदि एक ही रोग के विभिन्न नाम हैं। अण्डग्रन्थि (testicles) जिस थैली में होती है उसमें पानी सा तरल (Liquid) भरना ही इसका मुख्य लक्षण है।

hydrocele
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पानी भरने से आकार में वृद्धि होना स्वाभाविक ही है। अतः इसका वह भाग जिसमें पानी भर जाता है दूसरे की अपेक्षा बड़ा होता है। यहाँ चित्र में अण्डकोष ग्रन्थि में पानी भरा हुआ है। इस रोग में अण्डकोष की थैली में 50 से 1500 मि.ली. तक पानी भर जाता है। अपवादस्वरूप कहीं-कहीं तो इससे भी अधिक देखा गया है।

  • अण्डकोष वृद्धि हाइड्रोसील-यह दो शब्दों का संयोग है। हाइड्रो (Hydro) + सिलम (Coelom) हाइड्रो का अर्थ “जल” है जबकि सिलम का अर्थ “थैली’ । अतः हाईड्रोसील का अर्थ हुआ वह रोग जो जल की थैली जैसा हो।

Hydrocele in hindi के लिए जरूरी दिशानिर्देशो का सही वर्णन नीचे आर्टिकल मे किया गया है


हाइड्रोसील के कारण (causes of hydrocele in hindi)

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1 हाइड्रोसील के कारण (causes of hydrocele in hindi)
1.2 हाइड्रोसील का परीक्षण (examination of hydrocele in hindi)

Hydrocele in hindi: कई कारणों से मनुष्य को यह रोग हो सकता है जैसे कि…

  • फाईलेरिया बेनक्रॉफ्ट (Filaria Bancrofti) नामक रोगाणु का अण्डकोष (testicles) पर इन्फेक्शन करना
  • अण्डकोष की नसों में सूजन एवं प्रदाह (inflammation)
  • घुड़सवारी (horse riding) अधिक करना
  • साईकिल (cycling) पर लम्बी दूरी तय करना 
  • लंगोट (nappies) पहनने का तरीका सही ना होना
  • सुज़ाक (गानोरिआ) रोग के उपसर्ग स्वरूप अण्डकोष में वृद्धि

स्नायुविक सूजन या अण्डग्रन्थि (Testicle) में चोट लग जाना आदि में से कुछ भी इस रोग का कारण हो सकता है।

यद्यपि थोडा बहुत देश के प्रत्येक प्रदेश (state) में इस रोग की शिकायत होती है लेकिन बिहार, उत्तर-प्रदेश एवं उड़ीसा के लोग इस रोग के शिकार अपेक्षाकृत अधिक होते हैं।

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हाइड्रोसील के लक्षण (symptoms of hydrocele in hindi)

प्रारम्भिक अवस्था में रोगी को इस रोग के सम्बन्ध में कुछ भी अंदाजा नहीं होता है। अचानक अण्डकोष (testicles) में टनक (चिलक) मारने जैसा दर्द, ज्वर एवं ज्वर के साथ मिचली (nausea) का अहसास होता है।

  • अगले दिन औषधि प्रयोग से ज्वर कम हो जाने पर रोगी अपने को तो स्वस्थ समझने लगता है लेकिन जब ध्यान अण्डकोष की तरफ जाता है तो अण्डकोष आकार में बड़ा देखकर ताज्जुब होता है कि ये क्या हो गया ?

इसके बाद तरल रिसकर थैली में जमा होने का काम जारी रहता है जिससे थेली (scrotum) का आकार बढ़ता जाता है। यदि रोग फाईलेरिया रोगाणु के कारण हुआ हो तो बीच-बीच में सिहरन के साथ ज्वर के लक्षण अधिकतर रात को प्रकट होते हैं तथा प्रत्येक बार ज्वर होने के बाद अण्डकोष की वृद्धि में बढ़ोतरी होती जाती है।

बीच-बीच में अण्डग्रंथि से सम्बन्धित नसों में दर्द एवं प्रदाह (inflammation) के लक्षण बढ़ते जाते हैं। पीड़ा एवं आकार में वृद्धि के कारण रोगी को चलने में कठिनाई होती है।

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हाइड्रोसील के प्रकार (types of hydrocele in hindi)

यह प्रमुख रूप से दो प्रकार का होता है जैसे कि…

1. कम्युनिकेटिंग हाइड्रोसिल (communicating hydrocele) –

  • हाइड्रोसील की यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें टेस्टीकल की थैली पूर्ण रूप से बंद नहीं होती है इसमें थोड़ा दर्द तथा सूजन भी बनी रहती है यह समस्या प्रमुख रूप से ऐसे व्यक्तियों में पाई जाती है जिनको हर्निया की शिकायत हो

2. नॉन-कम्युनिकेटिंग हाइड्रोसिल (non communicating hydrocele) –

  • इस स्थिति में टेस्टिकल्स की थैली पूरी तरह से बंद हो जाती है तथा बचा हुआ तरल पदार्थ शरीर में जमा होने लगता है यह हाइड्रोसील का दूसरा रूप है

यह स्थिति मुख्य रूप से नवजात शिशु में देखने को ज्यादा मिलती है जो अपने आप ही कुछ महीनों के अंदर ठीक हो जाती है


हाइड्रोसील का परीक्षण (examination of hydrocele in hindi)

रोगी को पैर फैलाकर खड़े होने को कहें। अण्डकोष (testicles) की सीध में बैटरी जलायें। अण्डकोष के दूसरी तरफ बैटरी का प्रकाश दिखाई देगा।

परिणाम (result)-

  1. यदि इस रोग की शुरूआती अवस्था से ही चिकित्सा ना की जाये तो रोग धीरे धीरे बढ़ता जाता है।
  2. थैली में पानी बहुत अधिक जमा हो जाने से आकार में इतनी वृद्धि हो जाती है कि रोगी दस कदम ना ही दौड़ सकता है तथा ना ही तेजी से चल सकता है।
  3. कुछ ऐसे भी रोगी भारत मे देखे गये हैं जो अण्डकोष (testicles) को धोती के सहारे गले में बाँधकर ही चलफिर (walk) पाते हैं।
  4. अधिक वृद्धि के कारण लिंग (penis) अण्डकोष के अन्दर इस प्रकार छिप जाता है जिससे संभोग (sexual intercourse) क्रिया करना सम्भव ही नहीं हो पाता है।
  5. शल्य चिकित्सा (surgery) से कई रोगियों को स्थायी (permanent) लाभ हो जाता है लेकिन शत-प्रतिशत नहीं कहा जा सकता। बहुत से रोगी परेशान हैं जिनको शल्य चिकित्सा के बाद दुबारा ये रोग हो गया हैं।
  6. सर्जरी का सहारा जब कभी लें तो योग्य, दक्ष (expert) एवं अनुभवी सर्जन की ही शरण में जायें अन्यथा थोड़ी-सी भूल होने से रोगी सन्तानोत्पत्ति (reproduction) की क्षमता खो सकते हैं। ऐसे कई उदाहरण आपको अपने क्षेत्र में मिल जायेंगे।

प्रारम्भिक अवस्था से ही रोगी चोक्कना हो जाये तथा चिकित्सा करवा ले तो रोग जटिलता (complicate) की ओर नहीं बढ़ पाता है। थोडा-सा पानी जमा हो गया हो तो सिरिंज से पानी निकालकर औषधोपचार से चिकित्सा पूरी तरह से सम्भव है।

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हाइड्रोसील मे जरूरी निर्देश (Hydrocele in hindi)

हाईड्रोसील के रोगी को चाहिये कि हाईड्रोसील के कारणों को ठीक से समझ ले, उन्हें ध्यान में रखे एवं दैनिक जीवन में कामकाज करे।

  • दही व् केला खाने से अधिकतर कष्ट में वृद्धि (according to ayurveda) होती है, ऐसा रोगी को अपने दैनिक अनुभव से प्रमाणित हो गया होगा। यदि ऐसा न कर पाये हों तो ध्यान देने से यह बात सत्य प्रमाणित होगी। अतः यदि इनसे परहेज़ रखेंगे तो औपसर्गिक कष्टों से बचेंगे।
  • यदि कभी दही खानी ही हो तो यथासाध्य ताजा दही (सुबह का जमाया शाम को एवं शाम का जमाया सवेरे अगले दिन) ही खायें। दही में चीनी डालकर सैंधा नमक मिलाया जा सकता है।
  • यदि पका केला खाना ही हो तो कम से कम खायें। केला खाने के बाद छोटी 2-3 इलायची चबा लें। ध्यान रहे इलायची पके केले का दर्पनाशक है।
  • यथासाध्य भारी वज़न झुककर उठाने वाला काम ना करें।
  • समुचित ढंग से लंगोट (nappies) पहने

शादी से पहले यदि इस रोग का शिकार कोई व्यक्ति हो जायें तो सही चिकित्सा के बाद स्वस्थ हो जाने पर ही शादी करें अन्यथा जीवन दुखमय हो सकता है।


हाइड्रोसील का सामान्य उपचार एवं चिकित्सा (hydrocele treatment in hindi)

नोट- यह विधि डॉक्टर के द्वारा की जानी चाहिए 

  • सर्वप्रथम अंडकोष थैली में जमा पानी को निकाल दें। इसके लिये निम्नलिखित विधि को अपनायें। अपने दोनों हाथों को विसंक्रामक घोल से विसंक्रमित (sterilized) कर लें।
  • अब बायें (left) हाथ की हथेली में रोगी के अण्डकोष (scrotum) को पकड़कर रखें। दाहिने (right) हाथ से स्प्रिट में रूई भिगोकर अण्डकोष को अच्छी प्रकार साफ करें।
  • इसके बाद अण्डकोष के सामने-नीचे की ओर से “ट्रोकर” एवं कैनुला को सीधे प्रविष्ट (insert) करें, इस प्रकार कि ट्रोकर अण्डग्रंथि के सीध में पहुँच जाये। अन्दर का पानी (तरल) बाहर आ जाने के बाद ट्रोकर एवं कैनुला को निकाल लें। जिस छिद्र से ये यन्त्र प्रविष्ट किये गये थे वहाँ कॉलोडियन (Collodian) में रूई भिगा कर लगा दें।
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ट्रोकर का चित्र

उपरोक्त विधि से द्रव (fluid) निकाल लेने के बाद लिनीमेंट आयोडीन (anti septic solution) को उसके अंदर डाला जाता है। सिरिंज निकालकर अण्डकोष की थैली को अच्छी प्रकार मल दें ताकि अण्डकोष के अन्दर पूरी तरह से औषधि फैल जाये।

मलने की क्रिया के बाद सिरिंज से थोडा लिनीमेंट आयोडीन बाहर निकाल दें। इस प्रकार अण्डकोष (scrotum) में काफी जलन होगी लेकिन घबरायें नहीं, कुछ देर बाद जलन अपने आप ही ख़तम हो जायेगी।

भविष्य में दुबारा पानी जमा होने पर इसी क्रिया को दुहराया जा सकता है। लिनीमेंट आयोडिन के स्थान पर किसी अन्य दवा का प्रयोग सर्जन द्वारा किया जा सकता है।

Hydrocele उपचार  

अण्डकोष पर बेलाडोना (Belladonna) एवं ग्लीसरीन (Glycerin) के मिश्रित योग का लेप प्रतिदिन 3-4 बार करें।

  • फेरस सल्फेट (Ferrous Sulphate) -1 ग्राम
  • सोडियम क्लोराईड (Sodium Chloride) -1 ग्राम
  • एरण्ड तेल (Caster Oil) – 6 ग्राम

प्रत्येक को एक साथ मिलाकर खरल करें। मिश्रित योग को प्रतिदिन रात को सोने से पूर्व अण्डकोष पर लेप करें तथा लिंग (penis) को  छोड़ते हुए लंगोट (nappies) को सही तरीके से पहने। इसे नियमित रूप से कुछ दिन तक धैर्य (patience) के साथ जारी रखें। धीरे-धीरे अन्दर का तरल (fluid) सूखकर अण्डकोष (scrotum) सामान्य आकार में आ जायेगा।

सावधानी रखें कि यह लेप शिश्न (penis) पर ना लगे। यह भी ध्यान रखें कि साफ कपडे पर दाग भी इस लेप से लगना सम्भव है। इसलिए पुराने कपड़े का ही प्रयोग करें तो अच्छा है।

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एलोपैथिक चिकित्सा (हाइड्रोसील का अंग्रेजी दवा टेबलेट)

इस रोग में मुख्यतः चार प्रकार की औषधियाँ प्रयोग की जाती है

  • 1. फाईलेरियारोधी एवं रोगाणु रोधक औषधियाँ (Antifilarial and Antibacterials)
  • 2. मूत्र एवं जनेन्द्रिय संस्थान की दर्दनाशक औषधियाँ (Urinogenital Antispasmodic Medicines)
  • 3. स्टेरॉयड सम्बन्धी औषधियाँ (Corticosteroids)
  • 4. पोषक तत्त्व आपूर्तिकारक औषधियाँ (Nutritional Supplements)

ये औषधियाँ एक-दूसरे से भिन्न हैं लेकिन इस रोग में एक-दूसरे के पूरक होने के कारण साथ-साथ भी दी जाता हैं जिससे शीघ्र सफलता मिलती है। आगे इनका क्रमशः वर्णन किया जाता है।

1. फाइलेरियारोधी एवं रोगाणुरोधक औषधियाँ (हाइड्रोसील की अंग्रेजी दवा)-

  • डाई-ईथायल कार्बामेजिन साइट्रेट (Diethylcarbamazine Citrate)– यह इस रोग (lymphatic filariasis) की सर्वोत्तम औषधि है। यह अण्डकोष वृद्धि के अतिरिक्त श्लीपद (elephantiasis) भी सफल औषधि है।

प्रयोगविधि –

  • 1 मि.ग्रा. प्रति किलोग्राम शरीर के हिसाब से दैनिक मात्रा निर्धारित करके तीन विभाजित मात्राओं में दें। प्रथम दिन इस प्रकार देने के बाद अगले दो-तीन दिन में । मि.ग्रा. को बढाकर 6 मि.ग्रा. प्रतिकिलो शरीर भार के हिसाब से 3 विभाजित मात्राओं में दे। पूर्ण चिकित्सा की अवधि तीन सप्ताह। यह बाजार में अनेक नामों से अनेक कम्पनियों द्वारा निर्मित उपलब्ध है।

उदहारण किए लिए…

tablet Banocide 50/100 mg


2. मूत्र एवं जननेन्द्रिय संस्थान की दर्दनाशक औषधियाँ (हाइड्रोसील ट्रीटमेंट)-

  • हाईड्रोसिल शरीर के जिस अंग को अचानक प्रभावित करता है वह जनेन्द्रिय संस्थान का ही एक प्रमुख अंग है। इसलिए हाईड्रोसिल में पीड़ा उत्पन्न होने पर इस स्थान की ही दर्दनाशक औषधियाँ प्रयोग होती हैं।

रोग थोड़ा देर से भी ठीक हो परन्तु पीड़ा से रोगी हमेशा परेशान होता है। कभी-कभी पीड़ा से प्राण संकट में पड़ जाते हैं। इसलिए प्रत्येक चिकित्सक को चाहिये कि इस श्रेणी का परिपक्व ज्ञान प्राप्त करके ही चिकित्सा करें। आगे इस श्रेणी की कुछ औषधियों की चर्चा की जा रही है

डायसाइक्लोमिन (Dicyclomine) यह मूत्र एवं जनेन्द्रिय संस्थान के अतिरिक्त आँत, पित्ताशय, आन्त्रप्रदाह, कष्टरज जैसी अन्य कई रोगों को दूर करने में भी सफल औषधि है। वयस्क को 10-20 मि.ग्रा. प्रतिदिन 3-4 बार दे सकते है। यह अधिकतर अन्य पीड़ा औषधि या औषधियों के साथ दी जाती है।

  • जो 6 मास के बच्चों के लिये उपयुक्त नहीं है। बड़े बच्चों को 10 मि.ग्रा. तक दिन में 3 बार दें सकते है। इंजेक्शन 20 मि.ग्रा. माँसान्तर्गत (IM) डॉक्टर के निर्देश अनुसार 4 से 6 घण्टे अंतराल पर लगाया जा सकता है। दैनिक कुल मात्रा 80 मि.ग्रा. से अधिक नहीं दे सकते।

दो वर्ष से अधिक आयु के बच्चों को 10 मि.ग्रा. माँसान्तर्गत प्रत्येक 6 घण्टे बाद आवश्यकतानुसार डॉक्टर के निर्देश अनुसार दिया जा सकता है । दैनिक कुल मात्रा 40 मि.ग्रा. से अधिक न हो। इसके व्यापारिक नाम, रूप तथा निर्माता का नाम नीचे दिया जा रहा है।

  • सेण्टवीन Centwin (Centaur)-इंजेक्शन 10 मि.ग्रा./मि.ली., वायल 2 मि.ली. का उपलब्ध।
  • क्लोमिन Clomin (Core)-ड्रॉप्स-100 मि.ग्रा./मि.ली., पैकिंग 10 मि.ली., इंजेक्शन 20 मि.ग्रा./2 मि.ली.।
  • साइक्लोपाम Cyclopam (Indoco)-इंजेक्शन 10 मि.ग्रा./मि.ली. पैकिंग 10 तथा 30 मि.ली. में उपलब्ध।
  • कॉलिगॉन Coligon (Fourts)-टेबलेट 20 मि.ग्रा. की उपलब्ध।
  • Dysmen injection
  • Meftal spas

3. स्टेरॉयड सम्बन्धी औषधियाँ (हाइड्रोसील में सूजन की दवा)-

यह कार्टीज़ोन श्रेणी की औषधि है जो एड्रिनाल कॉर्टेक्स से प्राप्त एक प्रकार के हॉर्मोन से निर्मित होती है। यह अनेक रोगों में उपयोगी है। विशेषकर इनमें प्रदाह (inflammation), प्रदाहयुक्त जलन एवं दर्द को दूर करने के चमत्कारिक गुण हैं। हाईड्रोसिल में शुक्र-रज्जु (epididymus) में प्रदाहयुक्त दर्द होता है। अण्डकोष भी लालिमा (redness) लिये सूजा हुआ प्रतीत होता है।

  • ऐसी परिस्थिति में रोगाणुरोधी औषधियों (antibacterials) से लाभ होने की संभावना हो तो भी इसे पूरक के रूप में साथ-साथ चलाना आवश्यक तथा अनुकूल है।
  • क्योंकि जहाँ यह रोगाणुरोधी के साथ एक पूरक औषधि के रूप में सूजन तथा प्रदाहनाशक गुणों के कारण सहायक औषधि प्रमाणित होती है वहीं रोगाणुरोधी (Antibacterials) से उत्पन्न प्रत्युर्जता (Allergic state) को नियंत्रित करने की भी क्षमता से युक्त होने के कारण यह बहुत प्रशंसित दवा है

अर्थात् इनमें मुख्य 3 गुण हैं, प्रदाहनाशक, दर्दनाशक एवं एलर्जी की रोकथाम करने वाली। इन गुणों के कारण कई स्थानों पर मुख्य औषधि के रूप में एवं कई स्थानों पर सहायक औषधि के रूप में प्रयोग होती है।

इस श्रेणी की कुछ औषधिया इस प्रकार है जैसे कि…

बेटामेथाज़ेन (Betamethasone) –

  • सामान्य मात्रा 0.6 से 7.2 मि.ग्रा. दैनिक है जो कि रोगी की उम्र एवं रोग की उग्रता को देखते हुए निर्धारित की जाती है। यह मौखिक (Oral) एवं इंजेक्शन द्वारा माँसान्तर्गत/शिरागत IM/I.V.) लगाया जाता है। माँसान्तर्गत या शिरागत बहुत धीरे-धीरे लगायें अथवा 4 से 20 मि.ग्रा. 24 घण्टे में 4 बार तक डॉक्टर के निर्देश अनुसार लगाया जा सकता है।
डेक्सामेथासोन (Dexamethasone) –
  • 3-6 मि.ग्रा. विभाजित मात्राओं में बाँटकर दें। माँसान्तर्गत या शिरान्तर्गत प्रारम्भिक मात्रा 0.5 से 20 मि.ग्रा. है। जिसकी आवश्यकतानुसार पुनरावृत्ति की जा सकती है। इस बात का ध्यान रखें कि कुल मात्रा वयस्क के लिये 80 मि.ग्रा. से अधिक नहीं होनी चाहिये। चाहे रोग की उग्रता कितनी ही क्यों न हो। इसी आधार पर बच्चों की मात्रा भी निर्धारित करें। बाहरी प्रयोग के लिये इसका मलहम (Ointment) उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त…
  • Fludrocortisone
  • Hydrocortisone
  • Prednisolone
  • Methylprednisolone आदि बहुत ही असरदार दवाएं है

4. पोषक तत्त्व आपूर्तिकारक दवायें (Nutritional Supplements) –

  • एक कहावत है “समरथ के दुःख नाहि गोसाई’ अर्थात् सामर्थ्य (शक्ति) रहने पर कोई दुख नहीं होता या यों कहें कि दुख से (रोगों) से संघर्ष करने की क्षमता इस प्रकार पैदा हो जाती है शरीर में कि हमें अधिक कष्ट झेलना नहीं पड़ता है।

जब कोई संक्रामक रोग फैलता है, कुछ शुरुआत में ही प्रभावित हो जाते हैं या चपेट में आ जाते हैं, तो कुछ बाद में व् कुछ तो अन्त तक सुरक्षित ही रहते हैं। ऐसा उनके शरीर की रोग संघर्ष क्षमता (immunity) भिन्न-भिन्न होने के कारण होता है।

  • यह क्षमता शरीर की कोशिका के अन्दर पोषक तत्त्व की आपूर्ति पर निर्भर है। यही कारण है कि कोई भी चिकित्सक मूल रोग की औषधियों के साथ-साथ पोषकतत्त्व युक्त औषधियाँ (Tonics) अवश्य देते हैं। चाहे वो कैप्सूल्स, टिकियाँ, सीरप या इंजेक्शन किसी भी रूप में क्यों न हों व् देना भी चाहिये।

क्योंकि शारीरिक रूप से गठन-कद-काठी से हृष्ट-पुष्ट दिखने वाला व्यक्ति भी अन्दर से शक्ति से भरपूर ही हो, यह आवश्यक नहीं है। दूसरी बात यह है कि अधिकांश रोग तत्सम्बन्धी रोगाणु (Bacteria) के द्वारा संक्रमित होने के कारण होते हैं। इसलिए उन्हें ठीक करने के लिये रोगाणु रोधी (Antibiotics) का सेवन आवश्यक होता है।

ये एण्टीबायोटिक्स रोगाणुओं को नष्ट करने के साथ-साथ शरीर में भी कुछ हलचल मचाते हैं। कुछ कोशिकायें नष्ट होते हैं, यहाँ तक कि जीवन शक्ति भी कमज़ोर पड़ जाती है। इस क्षतिपूर्ति की दृष्टि से भी चिकित्सा करते समय अपने रोगी को पोषक औषधियाँ देते रहना आवश्यक ही नहीं, परमावश्यक भी है।

इसलिए हाइडोसिल के रोगी के लिये भी जहाँ भिन्न-भिन्न औषधियों का सेवन कराने का पीछे निर्देश दिया गया है वहीं पोषक तत्त्व आपूर्तिकारक औषधियों का सेवन कराना भी जरूरी है।


हाइड्रोसील का आयुर्वेदिक दवा (Ayurvedic Medicines for Hydrocele)

  1. सुवर्ण समीर पन्नग रस-फिरंगजन्य अण्डमाँस वृद्धि में यह बहुत ही उपयोगी है। 60 से 120 मि.ग्रा. शहद या अदरक के रस के साथ सुबह-शाम दें।
  2. व्याधिहरण रसायन-60 से 120 मि.ग्रा. सुबह और शाम शहद, अदरक के रस या घृत के साथ।
  3. शशिशेखर रस-1-1 टिकिया सुबह-शाम एरण्डमूल के क्वाथ के साथ सोंठ चूर्ण मिलाकर दें अथवा बड़ी हरॆ का चूर्ण शहद में मिले अनुपान के साथ। यह योग अन्त्रवृद्धि (hernia) की भी सफल औषधि है।
  4. वृद्धिबाधिका बटी-1-1 टिकिया सुबह-शाम जल या बड़ी हरीतकी के क्वाथ के साथ देने से अण्डवृद्धि एवं आँत उतरना ठीक हो जाता है। विशेषकर अण्डकोषवृद्धि की प्रारम्भिक अवस्था से ही इसका सेवन कराने से अपेक्षाकृत अधिक लाभ होता है। थैली में पानी की मात्रा बहुत अधिक जमा हो जाये तो अधिक लाभ इससे नहीं होता है। औषधि सेवन के साथ-साथ एरण्ड पत्र पर घी लगाकर सेंक करें। अण्डकोष वृद्धि होने पर इसे रखकर लंगोट बाँधने का निर्देश दें।
  5. वृद्धिहरी वटिका-2 टिकियाँ प्रतिदिन 2-3 बार ठण्डे जल के साथ दें। इससे वातज-कफज अण्डवृद्धि एवं अन्त्रवृद्धि (हर्निया) दोनों ठीक हो जाते हैं। इससे पेट भी साफ हो जाता है।
  6. महामंजिष्ठाद्यरिष्ट-15 से 30 मि.ली. सुबह-शाम भोजन के बाद समभाग जल मिलाकर दें। यह अण्डकोष वृद्धि और श्लीपद (फीलपाँव) दोनों में लाभप्रद है।
  7. चव्यकारिष्ट-15 से 30 मि.ली. बराबर जल मिलाकर सुबह-शाम भोजन के बाद दे, अण्डकोष वृद्धि (अण्डवृद्धि) और अन्त्रवृद्धि में लाभप्रद है।

पंचगव्य घृत-

5 से 15 ग्राम तक गर्म पानी में मिलाकर सुबह-शाम लेने से अण्डकोषों की सूजन दूर हो जाती है। हल्के हाथों से मालिश की भाँति प्रयोग करें।

  • नारायण तेल-10 से 15 बूँद गर्म दूध में मिलाकर प्रतिदिन 3 तीन बार पीने से तथा नाक व कानों में टपकाने से और अण्डकोष वृद्धि में लगाने से बच्चों एवं वयस्कों को लाभ होता है।
  • सैन्धवादि तेल बृहत-15 से 20 बूंद दूध या किसी खाद्य पदार्थ में मिलाकर आन्तरिक सेवन एवं ऊपर से प्रभावित स्थान पर (अण्डकोषों पर लगाने से) लाभ होता है। प्रतिदिन 2-3 बार आन्तरिक एवं बाहरी प्रयोग करें।

विशेष ध्यान दें

इन आयुर्वेदिक औषधियों का इस्तेमाल रोग की शुरुआती अवस्था में आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह मशवरा करने के बाद इस्तेमाल करने से लाभ होता है रोग बढ़ जाने पर शल्य चिकित्सा ही सही इलाज है ऐसी स्थिति में सर्जरी का सहारा लेकर हाइड्रोसील की समस्या को बिल्कुल ठीक किया जा सकता है

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हाइड्रोसील का होम्योपैथिक इलाज

ओरम मेट (Aurum Met.) 3 x 200 – गर्मी या पारददोष से उत्पन्न दाहिनी ओर के अण्डकोष प्रदाह के साथ हाइड्रोसील हो तो यह उपयोगी है। प्रतिदिन 2-3 मात्रायें दें।

स्पंजिया (Spongia T.)3 x 200 -गर्मी या पारद सदृश दोषों के कारण यदि अण्डकोष की बायीं ग्रन्थि में प्रदाह के साथ हाइड्रोसील हो तो यह लाभप्रद है। प्रतिदिन 2-3 मात्रायें दें।

कैल्क. फ्लोर (Cale. Fluor) 6, 30, 200- अण्डकोष में हाइड्रोसील एवं इस कारण से अण्डकोषों का फूलना में प्रतिदिन 3 मात्रायें दें।

मर्क सॉल या मर्क वाईवास (Merc-Sol or Merc Vivas)2 से 200 शक्ति तक एक शिरा, एक ओर का फोता बढ़ना, अण्डकोष का फूलना, थोड़ा बहुत कड़ा हो जाना, उसमें धीरे-धीरे पीप (pus) पैदा हो जाना में लाभदायी है। प्रतिदिन 2-3 मात्रायें दें।

रोडोडेण्ड्रॉन (Rhododendron) 2 x, 20 – अण्डकोष की सूजन, शुक्र-रज्जु (epididymus) की सूजन, एवं अण्डकोष की वृद्धि इन तीनों में चाहे दर्दयुक्त हो या बिना दर्द का, यह लाभदायी है। इसमें दर्द ऐसा होता है कि जैसे शुक्र ग्रन्थि को मुट्ठी में दबाकर चूर-चूर किया जा रहा हो। प्रतिदिन 3-4 मात्रायें दें। 

एम्पेलोपसिस (Ampelopsis) Q, 3लगातार कुछ दिन के नियमित प्रयोग से अनेक हाइड्रोसील के रोगी रोगमुक्त हो सकते हैं मूल अर्क (mother tincture) 5 से 15 बूंद प्रतिदिन 3 बार एवं 3 शक्ति की प्रतिदिन 3 मात्रायें दें। दोनों पर्याय क्रम से एक साथ भी दी जा सकती हैं।

साईलिसिया (Silicea) 1 M – चर्म वृद्धि के चलते अण्डकोष के आकार में वृद्धि हो तो ये फायदेमंद है

सॉपामेटो (Saw Palmetto) Q –  हाइड्रोसील और धातुदौर्बल्य में यह विशेष उपयोगी है। मूल अर्क (Q) 5 से 15 बूंद प्रतिदिन 3 बार पानी में मिलाकर दें।

ओरम-म्यूर नेट्रोनेटम (Aurum-Mur Natronatum) 3 x

अण्डकोष के कड़ेपन की पुरानी अवस्था में इससे पूर्ण लाभ हो जाता है। नियमित सेवन से धीरे-धीरे कड़ापन दूर होकर अण्डकोष पूर्वाकार में निश्चित रूप से आ जाता है। प्रतिदिन 3-4 बार थोड़े पानी में मिलाकर 2-3 बूंद दें।

हाईड्रोकोटाईल ए. (Hydrocotyl-AS) Q (मूल अर्क) – यह औषधि अण्डकोष (Testicles) पर अधिक क्रियाशील है। यह औषधि हाइड्रोसील में प्रसिद्द औषधि के रूप में दी जाती है। 5 से 15 बूंद पानी में मिलाकर दें। बाल, वृद्ध सबके लिये समान रूप से उपयोगी है।

पल्सेटिला नाई. (Pulsatilla N.) 3, 6, 30- बायाँ अण्डकोष धीरे-धीरे बढ़ रहा हो साथ ही दर्द भी हो तो इसका प्रयोग करें। प्रतिदिन 3-4 मात्रायें दें।

ग्रेफाइटिस (Graphites) 30, 200, IM. – शुष्क त्वचा और जननेन्द्रिय शोथ बायीं ओर स्पष्ट रूप से हाइड्रोसील हो रहा हो तो इसका प्रयोग अनुकूल है। 30 शक्ति प्रतिदिन 3 बार, 200 शक्ति मात्रा सुबह-शाम या 1- M शक्ति प्रत्येक सप्ताह एक मात्रा दें।

हेमामेलिस (Hamamelis) Q, Ix-  अण्डकोष की सूजन के साथ-साथ शुक्र रज्जु की शिरायें यदि सूज गयी हों तो अन्य की अपेक्षा इसका प्रयोग उत्तम है। Q (मूल अक) की 5 से 15 बूंदे थोड़े जल में मिलाकर प्रतिदिन 3 बार दें।

अर्निकामाण्टेना (Arnica mont.)3, 6, 30यदि अण्डकोष वृद्धि की हिस्ट्री में कहीं चोट लगने का कारण हो तो किसी भी सुनियोजित औषधि सेवन करने के साथ-साथ बीच-बीच में इसकी 1-1 मात्रा देते रहें।


अण्डकोष वृद्धि एवं अण्डग्रंथि प्रदाह (hydrocele and Orchitis)

हाईड्रासिल के साथ साथ आर्काइटिस को जानना बहुत ही आवश्यक है अन्यथा भ्रम में ज्यादातर  चिकित्सक भी आर्काइटिस को हाइड्रोसिल समझ लेते हैं। जबकि दोनों एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न हैं।

  • आम धारणा है कि सामान्य तौर पर लोग अण्डकोष के आकार में वृद्धि होने को हाईड्रोसिल समझते हैं जबकि अण्डकोष के आकार में वृद्धि होना कई बातों पर निर्भर है।

जिनमें दो प्रमुख है- पानी जमा होने के कारण थेली का आकार बढ़ जाना जिसे हम हाइड्रोसील कहते हैं दूसरा अण्डग्रन्थि में प्रदाह (inflammation) होने से सूजन के कारण थेली के आकार में वृद्धि होना इसे हम अण्डग्रन्थि प्रदाह (Orchitis) कहते हैं। इस प्रकार मात्र अण्डकोष का बढ़ना हाईड्रोसिल नहीं है।

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FAQ

Q हाइड्रोसील बढ़ने का कारण क्या है?

A पुरुष के अंडकोष के बाहरी आवरण में तरल यानि द्रव पदार्थ का ज्यादा जमा हो जाना जिस वजह से अंडकोष में सूजन की स्थिति उत्पन्न हो जाए उसे हाइड्रोसील कहते हैं हाइड्रोसील की समस्या अकेली या हर्निया के साथ भी हो सकती है


Q हाइड्रोसील में क्या परहेज करना चाहिए?

A ज्यादा प्रोसैस्ड फूड, जंक फूड, कैफीन वाले पदार्थ, पका हुआ केला, दही, ज्यादा लाल मिर्च, गरम मसाला इत्यादि पदार्थों से ऐसे मरीज को बचना चाहिए


Q अंडकोष में पानी भर जाए तो क्या करना चाहिए?

A अंडकोष में पानी भरने से अंडकोष फट सकते हैं उनमें संक्रमण के कारण पीप (pus) पड़ सकती है ऐसी स्थिति में तुरंत ही बढ़िया शल्य चिकित्सक (surgeon) से सलाह मशवरा कर इसका इलाज करवाना चाहिए


Q हाइड्रोसील कितने दिन में ठीक हो जाता है?

A सर्जरी के बाद मात्र 5 से 7 दिन में हाइड्रोसील की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है


Q क्या हाइड्रोसील से मौत हो सकती है?

A जी नहीं, हाइड्रोसील अंडकोष मे जमा तरल पदार्थ के कारण होता है इसमें संक्रमण के कारण दर्द व सूजन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है पुरुष की पौरूष शक्ति कम हो सकती है परंतु इसमें मौत नहीं होती


Q हाइड्रोसील के ऑपरेशन में कितना खर्च आता है?

A सरकारी अस्पताल में हाइड्रोसील का ऑपरेशन बिल्कुल फ्री हो जाता है प्राइवेट हॉस्पिटल में 5000 से 10000 रुपए तक खर्च हो सकते हैं


Q हाइड्रोसील का पानी कैसे निकाला जाता है?

A हाइड्रोसील का पानी निकालने में कुशल सर्जन को मात्र कुछ मिनट्स का समय ही लगता है इसके लिए एस्पिरेशन विधि का इस्तेमाल किया जाता है


Q क्या बिना सर्जरी के हाइड्रोसील ठीक हो सकता है?

A नवजात शिशुओं में होने वाला हाइड्रोसील आमतौर पर 6 से 12 महीनों में अपने आप ठीक हो जाता है परंतु व्यस्क पुरुषों में होने वाले हाइड्रोसील में शल्य चिकित्सा का सहारा लेना पड़ सकता है


Q अंडकोष की सूजन कैसे दूर करें?

A अंडकोष में मरोड़ (torsion) आना एक मेडिकल आपातकालीन की स्थिति है ऐसी स्थिति में तुरंत ही बढ़िया शल्य चिकित्सक से सलाह मशवरा कर तुरंत ही इसका इलाज करवाना बहुत जरूरी है

बाकी अंडकोष में सूजन का अगर कारण गंभीर नहीं है तो ऐसी स्थिति में सामान्य सूजन कम करने वाली दवाइयों (NSAIDs) के इस्तेमाल से बहुत फायदा होता है


Q अंडकोष क्यों फूल जाता है?

A अंडकोष में वेरीकोसिल (varicocele) की समस्या होने पर अंडकोष एक तरफ से फूल जाता है यह समस्या अंडकोष में मौजूद शिराओं (veins) में आई हुई विकृति के कारण उत्पन्न होती है


निष्कर्ष (Hydrocele in hindi)

हाइड्रोसील या अंडकोष वृद्धि अंडकोष में ज्यादा मात्रा में तरल पदार्थ के जमा होने के कारण होता है ऐसी स्थिति में अंडकोष को लंगोट आदि से सहारा देकर रखना बहुत जरूरी है ऐसी स्थिति में अंडकोष जितना लटकते रहेंगे उनका आकार बढ़ता ही जाएगा 

इस प्रकार की समस्या उत्पन्न होने पर तुरंत ही किसी अच्छे शल्य चिकित्सक से सलाह मशवरा करना चाहिए अगर सर्जरी की जरूरत पड़े तो सरकारी अस्पताल में बिल्कुल फ्री सर्जरी आप करवा सकते हैं 

यह ऑपरेशन माइनर कैटिगरी (minor surgery) में आता है जिसकी जटिलताएं (complications) ना के बराबर है इसलिए सर्जरी के दौरान आपको बिल्कुल भी घबराना नहीं है

मैंने यहां पर Hydrocele in hindi के हर एक पहलू की चर्चा विस्तार से की है कृपया इस आर्टिकल को ध्यान से पढ़ें तथा आगे शेयर करें


Disclaimer (Hydrocele in hindi)

इस आर्टिकल में दी गई नींद की दवाइयों की जानकारी केवल ज्ञान मात्र के लिए है कृपया नीचे दी गई किसी भी अंग्रेजी दवाई को बिना डॉक्टर की सलाह बिल्कुल भी इस्तेमाल ना करें

  • क्योंकि इन दवाइयों के सेवन से कई प्रकार के शारीरिक तथा मानसिक दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं
  • बाकी यह दवाइयां सिर्फ डॉक्टर की पर्ची पर ही मिलती है इसलिए डॉक्टर की सलाह से ही इस्तेमाल की जानी चाहिए

इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद किसी भी दवा का इस्तेमाल अपनी मर्जी से करने से अगर कोई नुकसान होता है तो इसका जिम्मेदार वह व्यक्ति खुद होगा हमारी इसमें कोई भी जिम्मेदारी नहीं होगी

इसे भी पढ़ें“टाइफाइड की जांच in हिंदी”

Information Compiled- by Dr Vishal Goyal

Bachelor in Ayurvedic Medicine and Surgery

Post Graduate in Alternative Medicine MD (AM)

Email ID- [email protected]

Owns Goyal Skin and General Hospital, Giddarbaha, Muktsar, Punjab

“Hydrocele in hindi” पढने के लिए धन्यवाद…Hydrocele in hindi


सन्दर्भ:

https://medimetry.com/questions/left-side-testical-pain/- Dicyclomine control hydrocele pain

https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S2090123217300322- steroid role in hydrocele swelling

https://jish-mldtrust.com/management-of-hydrocoele-through-homoeopathy-a-case-report/- Rhododendron homeopathic medicine in hydrocele

https://www.beaumont.org/treatments/scrotal-testicular-conditions-treatment- NSAIDs role to reduce swelling in hydrocele


 

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